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अनूठा है न्यूजीलैंड का कापिती टापू

अनूठा है न्यूजीलैंड का कापिती टापू

न्यूजीलैंड की राजधानी वैलिंगटन से करीब 1 घंटे की दूरी पर स्थित कापिती टापू कुछ दुर्लभ प्रजाति के पक्षियों तथा जीव जंतुओं का आवास है। इनमें वह धब्बों वाला कीवी पक्षी भी शामिल है जो न्यूजीलैंड की मुख्यभूमि से भी विलुप्त हो चूका है। इस टापू की सैर वक्त में पीछे जाने जैसा अनुभव होता है।

न्यूजीलैंड की मुख्यभूमि से नौका में छोटे से सफर के बाद कापिती टापू पर कदम पड़ते हैं। टापू पर एक ओर हरे-भरे वर्षावन तो दूसरी ओर तेज हवाओं का सामना करने वाली पहाड़ी की ढलानें दिखाई देती हैं।

अनूठा है न्यूजीलैंड का कापिती टापू

10 किलोमीटर लम्बे और 2 किलोमीटर चौड़े इस टापू की नैसर्गिक सुंदरता पर्यटकों का गर्मजोशी से स्वागत करती है। आज भी भी यहां का कुदरती नजारा ठीक वैसा ही है जैसा 1770 में था जब कैप्टन जेम्स कुक ने यहां पहले कदम रखे थे। टापू पर दुर्लभ पक्षियों की सुंदर आवाजें मनमोह लेती हैं।यह ऐसी खास आवाजें हैं जिन्हें धरती पर कहीं और नहीं सुना जा सकता है।

न्यूजीलैंड में पौधों तथा जीवों की कुछ बेहद अनूठी प्रजातियां पाई जाती हैं। शायद इसी वजह से जीव विज्ञानी जैरेड डायमंड ने इसे ‘अन्य ग्रह पर जीवन के अनुभव से मेल खाने वाली जगह’ कहा है।

कीवी की दुर्लभ प्रजातियों के अलावा वेका, कोकाको, ताकाहे जैसे अनेक दुर्लभ पक्षी यहां पाए जाते हैं। न्यूजीलैंड में यह टापू उन कुछेक स्थानों में से एक है जहां रात को विचरण करने वाले दुर्लभ कीवी पक्षी को देख सकते हैं।

इसकी अनूठी जैव विविधता तथा विरलता की एक वजह है कि 800 वर्ष पहले ही इंसान ने यहां कदम रखे जिससे पहले 8 करोड़ वर्षों से यह स्थान अलग-थलग रहा। मूल रूप से इस स्थान पर धरती पर रहने वाले स्तनपायी जीव नहीं थे बल्कि उड़ने में अक्षम पक्षी, कीट तथा छिपकलियों की बहुतायत थी।

न्यूजीलैंड की मुख्यभूमि में तो अब इंसान की दखलअंदाजी हर ओर है परंतु कापिती जैसे कई टापू अभी भी काफी हद तक अछूते हैं।

राजधानी वैलिंगटन से एक घंटे का सफर और उसके बाद छोटी-सी नौका यात्रा इस टापू पर पहुंचा देती है। 1897 में ही इसे नेचर रिजर्व घोषित कर दिया गया था। इसके बावजूद इंसानी दखल के बाद इसे फिर से पक्षियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बनाने में एक सदी से ज्यादा वक्त लग गया।

टापू पर करीब 200 वर्ष से रहने वाले आदीवासी इवी अब पर्यटकों को टापू की सैर करवाने का काम करते हैं। 1800 की शुरुआत में इस टापू पर कब्जे के लिए माओरी आदिवासियों के बीच खूनी संघर्ष हुए। हालांकि, न्यूजीलैंड में प्राकृतिक संरक्षण के सबसे पहले प्रयासों के तहत इस टापू पर ध्यान दिया गया। न्यूजीलैंड में बसने वाले यूरोपीय उपनिवेशियों को समय रहते ही महसूस होने लगा था कि इस टापू पर वनस्पति से छेड़छाड़ यहां पाए जाने वाले पक्षियों के लिए नुकसानदायक साबित हो रही है।

1800 के अंतिम हिस्से में संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी। किसानों को भी जंगलों की कटाई की वजह से प्राकृतिक आपदाओं का सामना कर पड़ रहा था। इसके बाद जल्द ही वहां कापिती सहित अनेक टापुओं को संरक्षित क्षेत्र घोषित कर दिया गया।

न्यूजीलैंड में लम्बे समय से प्रकृति का संरक्षण किया जा रहा है परंतु अभी भी वहां बड़ी संख्या में विलुप्त की कगार पर पहुंचे जीव हैं। मई में ही जारी एक रिपोर्ट के अनुसार पक्षियों को 80 प्रतिशत मूल प्रजातियां संकट में हैं और कई तो विलुप्ति की कगार पर पहुंच चुकी हैं।

जीवों के संरक्षण के प्रति गम्भीर न्यूजीलैंड सरकार ने वर्ष 2050 तक देश को शिकारी जीवों से मुक्त करने का महत्वकांशी लक्ष्य रखा है जिससे मूल प्रजातियों की सुरक्षा सुनिश्चित बनाई जा सके। वहां करीब 100 टापुओं से लगभग सभी शिकारी जीवों को खत्म किया जा चूका है।

कापिती टापू पर इन प्रयासों को सफलता मिली है। 1897 में इसका बुरा हाल था, जंगल कई जगहों से काटे जा चुके थे और शिकारी जीवों का बोलबाला था। गम्भीर प्रयासों से यहां से सभी शिकारी जीवों तथा मवेशियों को हटाया गया। चूहों का भी पूरी तरह से खात्मा किया गया। इसके बाद टापू पर मूल पक्षियों के लिए हालात ठीक हुए और आज इनकी यहां बहुतायत है।

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