हिमाचल प्रदेश हिमालयी चोटियों, घने जंगलों, शांत वातावरण और झरनों के लिए देश-दुनिया के पर्यटकों को आकर्षित करता है। प्रदेश में आज भी कई ऐसे अनछुए और ऐतिहासिक स्थल हैं, जिन्हें पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जा सकता है। इन्हीं में से एक है कोकेधार या कालीधार का वॉच टावर, जिसे स्थानीय लोग गुम्मर का किला या वॉच टावर भी कहते हैं।
कांगड़ा का ऐतिहासिक ‘वॉच टावर’
कांगड़ा में स्थित इस वॉच टावर तक पहुंचने के लिए मुख्य रूप से दो रास्ते हैं। एक रास्ता कोके गांव की ओर से जाता है, जबकि दूसरा लगड़ की तरफ से है।
लगड़ से आने वाला रास्ता कच्चा है और वर्तमान में इसी रास्ते का अधिक इस्तेमाल होता है। यह रास्ता सीधे फॉरेस्ट रैस्ट हाऊस तक पहुंचता है।
रैस्ट हाऊस से आगे पहाड़ी पर पैदल जाना पड़ता है, जहां ऊंचाई पर यह वॉच टावर स्थित है।
बुजुर्गों के अनुसार यहां से दिखता था ‘लाहौर’!
अंग्रेजों के समय से जुड़ा है इतिहास
वॉच टावर को लेकर स्थानीय लोगों के बीच लंबे समय से सुनने को मिलता रहा है कि इसे अंग्रेजों ने बनवाया था। स्थानीय लोगों ने बचपन से यह कहानी सुनी है कि अंग्रेज इस ऊंचे स्थान से दूर-दूर तक नजर रखते थे।
जब हमने इस संबंध में स्थानीय बुजुर्गों और दस्तावेजों की खोज की तो कई महत्वपूर्ण जानकारियां हासिल हुईं। इन दस्तावेजों की खोज इंटरनैट के माध्यम से की गई।
1879 के ‘ग्रेट ट्रिग्नोमैट्रिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ के रिकॉर्ड में गुम्बर हिल स्टेशन का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। रिकॉर्ड के अनुसार यह
ज्वालामुखी पर्वत शृंखला के उत्तरी छोर की एक प्रमुख चोटी पर स्थित था और गुम्बर वर्तमान में गुम्मर गांव इसके ठीक नीचे था।

1883-84 के गजेटियर में भी दर्ज है टावर
इस ऐतिहासिक कड़ी को और मजबूत करता है 1883-84 का ‘गेजेटियर ऑफ द कांगड़ा डिस्ट्रिक्ट’। इसमें साफ तौर पर गुम्बर पर एक ट्रिग्नोमैट्रिकल टावर यानी त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण स्टेशन और टावर होने का उल्लेख मिलता है। गजेटियर में इसकी ऊंचाई लगभग 3,900 फुट दर्ज की गई है। यह टावर ज्वालामुखी की पहाड़ी श्ृंखला पर स्थित सर्वेक्षण स्टेशन के रूप में दर्ज था। इससे यह स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश काल में गुम्बर की ऊंची चोटी का इस्तेमाल केवल सामान्य आवागमन या वन चौकी के लिए नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण और नक्शानवीसी के लिए भी किया जाता था।
अंग्रेज इसका इस्तेमाल किस काम के लिए करते थे?
ब्रिटिश शासन के दौरान ‘ग्रेट ट्रिग्नोमैट्रिकल सर्वे ऑफ इंडिया’ के तहत भारत के विस्तृत और वैज्ञानिक नक्शे तैयार किए जा रहे थे। इसके लिए पहाड़ों की ऊंची चोटियों पर सर्वेक्षण स्टेशन बनाए जाते थे।
इन स्टेशनों से दूर स्थित दूसरे सर्वेक्षण बिंदुओं को देखकर उनके बीच कोण मापे जाते थे। इन्हीं कोणों और गणनाओं के आधार पर पहाड़ों, घाटियों और दूसरे भौगोलिक स्थानों की सही स्थिति तय की जाती थी और नक्शे तैयार किए जाते थे। इसलिए गुम्बर से ऊपर स्थित ऊंची चोटी का चयन अपने आप में महत्वपूर्ण था।
1879 के सर्वे रिकॉर्ड में यहां सर्वेक्षण का स्थायी निशान बनाए जाने का भी उल्लेख मिलता है। इससे पता चलता है कि गुम्बर ब्रिटिश सर्वेक्षण नैटवर्क का वास्तविक हिस्सा था।
लाहौर दिखने की बातें
स्थानीय लोगों में यह धारणा भी है कि अंग्रेज इस ऊंचे स्थान से दूर-दूर तक नजर रखते थे और संभवतः यहां से लाहौर की दिशा पर भी निगाह रखी जाती थी। आसपास के गांवों के लोगों से बात की गई तो उन्होंने इस बात को पुख्ता तौर पर बताया। उन्होंने बताया कि यहां से अंग्रेज लाहौर तक नजर रखते थे लेकिन अभी तक मिले ऐतिहासिक दस्तावेजों में यह प्रमाण नहीं मिला है कि यहां से लाहौर दिखाई देता था।
हो सकता है कि अंग्रेजों ने सर्वेक्षण के लिए इस टावर को स्थापित किया हो और लोगों में धारणा बन गई होगी कि अंग्रेज लाहौर पर नजर रखते हों या एक संभावना यह भी हो सकती है कि दूरबीन से लाहौर तक रेंज जाती हो क्योंकि उस समय प्रदूषण का स्तर न के बराबर था लेकिन इसका कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिला है।
आग से क्षतिग्रस्त हुआ
स्थानीय लोगों के अनुसार वॉच टावर की पुरानी संरचना को वर्षों पहले एक घटना में आग लगने से नुकसान पहुंचा था। बताया जाता है कि किसी बारात के यहां आने के बाद यह घटना हुई थी। इसके बाद टावर का कुछ हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया और काफी समय बाद इसके पुनर्निर्माण का प्रयास किया गया।
पर्यटन की अपार संभावनाएं
कोकेधार का यह क्षेत्र इतिहास और प्राकृतिक सुंदरता का अनूठा संगम है। यहां से चीड़ के जंगल, फॉरैस्ट रैस्ट हाऊस और पहाड़ी की ऊंचाई से विहंगम दृश्य नजर आता है। इस स्थान को सरकार पर्यटन की दृष्टि से विकसित कर सकती है। यहां पर ट्रैकिंग और एडवैंचर टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं।
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